कहाँ जाए / kahan jaye
कहाँ जाए
जग-जग घुमु, हर नयनों में ढुँढु।
कहीं हो तेरा सामना, कहीं हो जाए सामना।
मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाऊँ कहाँ।
तु जो कह दे तो तारों संग सारा नुर बिछाऊँ यहाँ।
मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाऊँ कहाँ।
किस-किस से पुछे तेरा पता, किस-किस को कब तक निहारें यहाँ।
ना होता एतबार किसी पर ना विश्वास यहाँ, फिर हम जाए कहाँ।
मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाएँ कहाँ।
मन मेरा मन संजोए है ख्वाब कई, सपने कई।
तुम जो मिलोगे तो होगी पलकों पर तेरी सराहना।
होगा ना जग से कोई सिकवा ना रब से कोई गीला।
मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाएँ वहाँ, जाएँ वहाँ।
पर अभी तो तेरी यादों के दुनियाँ से जाए कहाँ।
जग घुमने से मिलता तु तो नयन सब जगह लङाए यहाँ।
ये माटी की मुरत देगी साथ कब तक यहाँ।
अब आ भी जा नयनों से नयन मिला ना दूर जा ना दूर जा।
मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाएँ कहाँ, जाए कहाँ।।
-कवितारानी।
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