साँझ सवेरे, मन के ढेरे / sanjh savere, man ke dhere
साँझ सवेरे, मन के ढेरे
दर-दर भटका लेकर मृत्युलोक का मटका।
ना पाया द्वार तेरा, मंदिर-मंदिर टटोले, द्वार-द्वार पर बोले।
क्या यहाँ हरि का आसरा।
बिती गई रैना, पर रैना पर कोई नहीं पाया कम तेरा मेरा फासला।
मन से बोले-तन को टटोले, क्या हो पाया कोई सासरा।
क्या है यहाँ हरि का आसरा।
गोधुलि बैला की रैला में पाया पावन सारा संसार यहाँ।
कर भक्ति लेकर तन-मन की शक्ति के होये अब तेरा आसरा।
क्या है यहाँ हरि का आसरा।
दिन-दिन घुमें संत-साधु के भी लुमे, हो ध्यान मग्न।
होकर भजन रत होकर अन्तर्मुखी ढुंढा आसरा।
क्या है यहाँ हरि का आसरा।
शाम को हर दिन करते आरती ढुब भक्ति रंग में पुजते हम पारथी।
क्या दुनिया जब क्या संसार यहाँ बस तेरा मेरा था यहाँ फासला।
क्या है यहाँ हरि का आसरा।
फिर जब मामा चन्दा आए नीन्द गहरी लाए तब सपनों से तेरा सामना।
लोक लुभावन लागा वो सब मनोहर लगा वो क्या ये तेरा आसरा।
क्या है यहाँ हरि का आसरा।
सब से पुछा हर भक्त से पुछा सक्स हर से पुछा पर कहीं ना मिला।
तेरा आसरा, क्या है तेरा आसरा, कहाँ है तेरा आसरा, कैसे पाऊँ तेरा आसरा।
कैसे आऊँ, पास आसरे के कैसे, कैसे, कैसे।।
-कवितारानी।
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