जीवन यही तो जीना होगा / jivan yahi to jeena hoga

 जीवन यही तो जीना होगा


हो घने बादल छाये।

बिजलिया कङके और डराये।

आँसुओं की धार निरंतर बहे।

लब सुखे रहे अनकहे।

मन में घुटन, चिखे दवायें।

इच्छायें चाहे अंदर ही मर जाये।

कङवा हो घूट वीना ही होगा।

जीवन है यही तो जीना होगा।।


साथ रहे लोग या छोङ जाये।

चले राह पर या गीर जाये।

दीवारों सी बन बाधायें आये।

पथ पर काँटों की सेज सज जाये।

बढ़े आगे लोग पिछे खिंचे जाये।

जोर आजमाईशें करते रहना होगा।

जीवन यही तो जीना होगा।।


आज की चोटे कल तक सताये।

कल के घाव नासुर बन जाये।

किलों से शब्द मन घायल कर जाये।

बिते लम्हें यादों को जलाये।

मन के बसे मन को बसाये।

दुर्गंध सी तन मन को घुटन कराये।

साँसों के सार ही तब रहना होगा।

जीवन यही तो जीना होगा।।


मटमैले नये परिधान हो जाये।

नहाये कई महिनें बीत जाये।

पीने को अशुध्द जल पाये।

खाने को बासी रोटी चलाये।

पल-पल कर लम्हें गुजारे जाये।

घङियों के घङे घङते जाये।

जीवन को निराधार तो धार में बहना होगा।

जीवन यही तो जीना होगा।।


बेसुध सुझ खोई रहे।

आँखों के तारे एकटक रहे।

कानों को प्रिय ना शब्द कोई।

स्वाद रस नीरस हर कोई।

नींद औझल हो फिर भी सोना होगा।

जीवन यही तो जीना होगा।।


अनिच्छा मन को बोझिल करें।

इच्छायें तन को लालायिच करें।

सपने सोते जगते आते रहे।

अश्रु धार नियमित नित रहे।

आशाओं की ढोर थामें रखना होगा।

जीवन यही तो जीना होगा।।


खोज अनचाहे की चाह रहे।

पाये हुए की कद्र रहे।

जो छोङ गये दर्द दाग करके।

माफ करें छोङ करके।

मन के कोनों को बढ़ाना है।

हर लहर नयी ऊँचाई पाना है।

सबके दिल का माँझी बने।

सबके मन का राजी रहे।

यही कोशिश करते रहना होगा।

जीवन यही तो जीना होगा।।


-कवितारानी।

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