मेरी छत से / meri chhat se

 मेरी छत से


फिर एक शाम अकेले में,

बैठा में निहार रहा।

सोंच रहा देख रहा,

यादों कि गालियों में घुम रहा।

कहता कुछ आते जातो से,

मिलता रोज मिलने वालों से।

तिराहे का ये नजारा है,

मन को मेरे प्यारा है।

एक ठोर बन बैठा हूँ,

बरसों से जमा बैठा हूँ।

एक ताङ पुरब चढ़ गया,

नीम छटी छटाई है।

मेरी कुटिया टीन ओढ़ आई है,

एक बगीया पङोसी की भी,

एक कुटिया गरीब पङोसी की भी।

सब कुछ बरसों से वैसा ही,

कुछ ना बदला सब वैसा ही।

देखा है बढ़ता अँधेरा,

होती छाया, खोती काया।

मेरी छत से, मेरी छत से।।


पश्चिम ढलती लाली है,

वो दिशा चुभने वाली है।

अब खाली पङी जगह कोई,

नई बनी है छत वही।

कोई बैठा अक्सर देखा करता था।

कुछ पल ही मैं मन हरता था।

वो प्यारा आँख का तारा खोया है।

याद आया वो मन रोया है।

दुखी सी चार मीनारें दिखी।

दिख पाया चेहरा कोई,

पर मन को भाया ना चेहरा कोई।

मुहॅ मोङ उत्तर पाया नयी छत,

अब नया साया।

माँ सी एक भोली छवि होती।

हाल पुछती सब ठीक होगा कहती।

यूँ ही दक्षिण सब छीपा सा।

अब मन है खोया सा।

फिर पुरब नजर करता मैं।

मेरी छत से देखता मैं।

ढुब गया आज का रवि।

होगा सवेरा बात नई।

मैं पश्चिम को गया पुरब में आया।

थोङा घुटा थोङा सरमाया।

अपने कल को अँधेरे में छोङ।

अपनी छत से तारे ओढ़।

रात चाँदनी विचरण करता।

रोज अँधेरे में आहे भरता।

आती जाती झलक डराती।

मेरे कल की धुप मुझे जलाती।

हिम्मत कर पुरब जपता।

जीवन सफर आगे बढ़ता।

मेरी छत से सबको हरता।

जीवन डगर आशायें करता।

मेरी छत से, मेरी छत से।।


-कवितारानी।

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