सब बदल गया है / sab badal gya hai

 सब बदल गया है।


बाल पक गये हैं,

हाँ बाल पक गये हैं।

देखे पुराने चित्रों को तो,

समझ आया कि,

हम थक गये हैं।


वैसे थकान सी सुरत,

बैचेनी, उदासी,

चेहरे की उङी रोनक,

ये पहले भी थी।


पहले भी हुआ करते पके बाल,

पहले भी रहती खुशी की तलाश,

पर आजकल उमर असर ज्यादा है।

जिम्मेंदारियों में समय आधा है।

सुबह का भोजन,

रात की नींद,

और खुद की परवाह अब कहाँ।


अब तो सुरज उदय होता है,

और शाम को अस्त,

वही बुढ़े लोगो से दुपहर सोते,

और दिन भर काम को रोते।


अब सब छुटा सा है,

अब सब बदला सा है।

सब कुछ मन का होना था।

अब मन सब का सा है।

हाँ समय बदल गया है।

सुरत भी बदल गयी है।

गाँ अब मैं बुढ़ा हूँ।

अपने अंत को अग्रसर हूँ।

पर मैं जिन्दा हूँ।।


-कवितारानी।

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