आशाओं को पुतला मैं / Aashao ka putla main
आशाओं को पुतला मैं
मैं आशाओं का पुतला, जलता अपने आप से।
नहीं किसी की बुराई खाई, ना ही जला किसी के ताप से।
अपनी कमीयों का मारा, मैं फिरता जला सा तेजाब से।
दर-दर को आशियाना मांगता, मैं जाता जलता अपने आप से।।
कल था शुरवीरों के साथ, अपने तेज से था प्रकाश में।
खुब कोशिशें की चमकनें की, मिटा दिया अंधकार में।
फिर से जमीन बदली गई, बदला है आप मेरा बदलाव में।
निस्तेज तेज छुपा हुआ है, छुपा हुआ जैसे बादलों की आङ में।।
आशा सर्पीली ढंस रही जीवन सार ये।
रोज नया सपना बुनती, कहती है यही संसार ये।
भुल भुलय्या नहीं जमती, नहीं भाता प्रकाश ये।
रोज भुगते दर्द नया, लगता जो सहा हुआ ताप ये।।
पश्चिम का सफर किया, छः माह था जैसे शोक संताप में।
रोज पुरब निहारता, करता याद अपनी जमीन रात में।
शाला का ताला होता, खुलता था ताला दुःख विषाद में।
कोठी में जाकर भोजन होता , खुोया रहता वहाँ हमेशा आप में।।
कहाँ सुकुन है मालिक मेरे कहाँ सवेरा लिखा ये।
रोज उठता अब विन तङपे पर बंधी नहीं आस ये।
जा टिकती है अनजानों में ढंसते रहते जो हर बात वे।
समझ ना पाता कैसे मन को भाते सब इन्सान वे।।
ठहर कहीं साँस लुँ की सुकन जहान आराम रहे।
ठण्डी छाँव तले बैठ सकु बाहों का कोमल हार रहे।
गमों की परछाई दुर हरे, हटे अँधेरा अनन्त आकाश से।
मिले जमीन संसार में शाँति, प्रगति करे निवास वे।।
आशाओं का जोर रहे, रहे बस जितना मुझमें।
मन बस तन पर रहे, छु ले आसमान ये।
बाधाओं को आधा कर, रहँ हमेशा उजास में।
साथ दे उसे शिखर दूँ, दुर रहे उसे आशिष में।।
मैं आशाओं का पुतला जलता अपने आप से।।
-कवितारानी।
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