प्रगति पथ पर गीत / Pragati path par geet
प्रगति पथ पर गीत
जीवन की इन रिमझिम झङियों में।
बहती नदियाँ और दरियाँ में।
आशाओं की थाम ढोर।
साँसो की लय से देखता भोर।
रोज नये सपने बुना करता हूँ।
मैं प्रगति पथ को चुना करता हूँ।
लहरे नहीं सैलाब आते।
दरियाँ को सागर बनाते।
ढुबा देते रोज बने मेरे मकानों को।
मैं फिर सुदृढ़ किले गढ़ा करता हूँ।
आशाओं की थाम ढोर।
साँसो को ले जाकर छोर।
रोज नये सपने बुना करता हूँ।
मैं प्रगति पथ चुना करता हूँ।
आज साथ है वो कल था नहीं।
जो कल था साथ आज दिखता नहीं।
रोज बदलते इंसानों को देखा करता हूँ।
मौसम के नये-नये नजारे देखा करता हूँ।
जब तक मिलती नहीं मंजिल मुझे।
मैं ऐसे नया गीत लिखता हूँ।
मैं रोज आशाओं पर जिया करता हूँ।
हर शाम घुटता हूँ हर रात मरता हूँ।
हर भौर जगाती जीवित फिर।
फिर से प्रगति पथ चुनता हूँ।
मैं रोज प्रगति पथ पर चलता हूँ।
मैं रोज आगे बढ़ता हूँ।।
-कवितारानी।
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