जैसे तैसे / jaise taise
जैसे तैसे
जैसे-तैसे दिन बित गये।
घर में उलझे सब बीत गये।।
ना यादों की टिस रही।
ना कोई बात विशेष रही।।
ऐसे कैसे ही सब बीत गये।
कहीं घुमें नहीं पर दिन बीत गये।।
आती जाती यादों ने सताया था।
रोज सुबह का चेहरा याद आया था।।
उठते ही पानी दीवारों पर करना।
याद रहा मकान का बनना।।
जैसे-तैसे काम करता रहा।
आहे भर लङ-लङ रहता रहा।।
ना मिलना रिश्तों से ज्यादा हुआ।
ना कोई मनका पास हुआ।।
देख मनके के मजे दर्द हुआ।
पर आते-जाते लोग हम दर्द हुआ।।
ऐसे वैसे मस्ती भी की।
बस एक महीना बीता अब याद ही।।
जाना है कल चला जाता हूँ।
याद रहे या ना रहे मैं भूल जाता हूँ।।
पुरानों को भुल नयों को अपनाना है।
कहीं मन लगाने का कोई बहाना है।।
आती जाती किस्मत खराब रही।
कुछ मन की दबी मन में रही।।
अब सब बस सवाल है।
अपने कहने वाले ही खराब है।।
जैसे-तैसे ये साल और निकालुँ मैं।
अपनी दुनियाँ बसाऊँ जी लुँ मैं।।
जी लूँ मैं।।
-कवितारानी।
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