आज बस जीते है / Aaj bas jeete hai
आज बस जीते है
जैसे घटायें काली बारिस की,
शीत लहर शरद ऋत की,
फुल बहार बंसत की,
हसीन वादियाँ कश्मीर की,
ठण्डी छांव गुलमोहर की,
तु आ जाती है पल-पल को,
महका जाती है कण-कण को,
भर जाती खाली पलकों को,
नम करती सुखे गालों को,
जगाये रखती काली रातों को,
वो पहर बीत जाते हैं,
लम्हें फिर सताते है,
राह एक टक नयन रह जाते हैं,
हर पल धङकन बढाते है,
घङी की सुई चुबाते है,
एक आस फिर आती है,
जैसे नई पहर बुलाती है,
भौर का तारा देखने को,
पुरब ऊजाला होने को,
पश्चिम अंधेरा हटने को,
रात काली कटने को,
पल-पल गिरने रहते है,
तील-तील कर जीते रहते हैं,
सबसे कहते रहते है,
हम बस आज को जीते है,
कल को बस पीते है,
आज बस जीते है।।
-कवितारानी।
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