बदला रुप / badla roop
बदला रुप
मुस्कान सजी होंठो पर, आँखों में गम छिपाये।
सजी संवरी दुल्हन बन, मन का भार छुपाये।।
सामने आते ही आह सी धङकन होती है।
दिखती हॅसती, मस्काती सी, अकेले में रोती है।।
काली घटायें कैश संवार कर इतराती है।
काली छाया नैन पर दिख कर राज बताती है।।
सेर सपाटा करती आदेशों पर चलती वो।
मन ही मन मनती आवेशों पर जलती वो।।
जग की जगती जोत बनी धधक रही अर्न्तमन को।
ऊजाले में चमक रही अँधयारे को अन्तर्रंग कर वो।।
आभा भौर सी बदल गई बनी दुपहर धूप अब।
आधा जोर ही कर रही हूई सुहागन रुप अब।।
खो गया योवन, जोगन अब जग की भीङ है।
सो गया ऊजाला सारा सपने अब धुमिल है।।
ओढ़ मुखौटा सति सावित्रि जग का बोझा अब।
मोङ जीवन अति विचित्र रोज का रोजा अब।।
आशाओं की छोङ डोर अब सपने थोपे जाते हैं।
राग आता नहीं भौर, अब अपने थोपे जाते हैं।।
जीवन डगर अगर होती ना, तो सार बदला होता।
भार अगर फेंका ना होता तो आधार और होता।।
सबकी सोंच, सोंच सबकी अब किया है वो भरना है।
रोज का रोना भी है, अब हॅस के मनना भी है।।
बदला है लिबाज, परिवेश, देश भी बदला है।
एक टक नजर केवल सोंच रही, मन भी बदल रे।।
-कवितारानी।
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