मैं व्यस्त / main vyast
मैं व्यस्त
हूँ पूर्वांचल में व्यस्त अपनी ही धुन का धुनी मैं।
ताजगी की सांसों को लिये हूँ मधुर फिजाओं की खुशबु सी भूनी मैं।।
आवाजों की आवाजाही है, आवाज अन्तर्मंन कराह कहीं।
धुनों में बटा हुआ हूँ, आगाज बर्हीमन वराह राही मैं।।
किस ओर मुख करुँ, हर ओर महक है फैली सी।
धरा काली, धूसर है, हर ओर महक है, धूल फैली सी।।
मृगमरीचिका से खुद ग्रसित, लक्षित अपने राह को।
मार्गदर्शक सा चल रहा, पीङित कर अपने आप को।।
था पश्चिम अस्तांचल सा रवि फैला अपने आप में।
दुर निगाह तकता था रवि होता अपने आप में।।
आवाज अंतिम छोर से आती रहती अपने आवेश में।
नित नीर नयन बहते करते रहते अपने आवेग में।।
नियमित, संयमित रवि उदय पूर्व की बन आवाज ये।
कथित कथनी कवि लय सूर्य की बन आवाज ये।।
-कवितारानी।
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