प्रतिभाओं की किसे पङी / pratibhao ki kise padi
प्रतिभाओं की किसे पङी
जहाँ चापलुसी ही ज्ञान हो, चमचागीरी अभिमान हो।
वहाँ काम और संस्था की किसे पङी, वहाँ प्रतिभाओं की किसे पङी।।
जहाँ स्वार्थ सिध्द कार्य किये जाते हो, नमक से ज्यादा हरामियों की गाई जाती हो।
हर वक्त अहम् और स्वयं का मान हो, वहाँ प्रतिभाओं का क्या ज्ञान हो।।
जेब जहाँ भरनी हो, कथनी करनी में भारी अंतर हो।
तानाशाही ही जब करनी हो, फिर प्रतिभाओं की क्या करनी हो।।
अकङ में ज्ञान ज्ञात ना हो पाता हो, अच्छे काम को नकारा जाता हो।
मिलने वालों को भरा जाता हो, वहाँ प्रतिभाओं का क्या करना हो।।
काम का अर्थ फिर बस काम रहे, व्यर्थ ही अच्छाई को काम मिले।
बेवक्त फिर सुनना जब पङे, वहाँ प्रतिभाएँ क्या करें।।
जंगल का राज भारी है, जो चिखे वही सबसे भारी है।
आलसी का जहाँ बस मौज हो, प्रतिभा रहकर भी वहाँ क्या करें।।
जहाँ अज्ञानता आनन्द बन गई हो, समझदार होना जहाँ मुर्खता हो।
मुर्खों को पुरस्कार हो, वहाँ प्रतिभाओं का क्या ही हो।।
हर वक्त प्रतिभा को जब टीस मिल, प्रशंसाओ को बस रीस मिले।
हर्ष पर विषाद जिससे फैल जाये, प्रतिभाएँ ऐसी जगह कहाँ रहे।।
-कवितारानी।
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