राही भ्रमित / Rahi bhramit
राही भ्रमित
है अंतर मन में जाल फैला,
कोश रहा तन जीवन को।
कितना दुर्बर है सहन करना,
मन ही मन की मजबुरी को।।
दर-दर भटक रहा है,
पथिक अपनी मंजिल को।
कितना कठिन है हासिल करना,
पथ से पथिक की धुरी को ।।
पल-पल कर क्षण बिते हैं,
गीन रहा तन घङियों को।
कितना मुश्किल है सह पाना,
टुटे मन के फेरों को।।
चेहरा-चेहरा देख रही है,
आँखें अपने प्रियतम को।
कितना मुश्किल है कह पाना,
कौन छिपा मन के कोनों को।।
छनक रही है पायल सुन रही कानों को,
कौन घङी बित जाये मिल नहीं रही मंजिल राही को।।
-कवितारानी।
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