व्यस्त हूँ / Vyast hun
व्यस्त हूँ
हूँ व्यस्त बहुत अपनी धुन में,
पीस रहा में अपनी धुन में,
दिख रहे बदलते नकाब,
चढ़ रहा है दुनिया का शबाब।।
जोर आजमाइशें मेरी चरम पर,
थक रहा हूँ मेरी बहस पर,
सात कोई-कोई है दर्शक,
कोई नहीं पथ प्रदर्शक।।
दीन हीन आते हैं,
देख मुझे समझाते हैं,
सम्पन्नों को मेरी समझ ना भाती,
आती जाती ईर्ष्या जलाती।।
भाई खाई में ही है अटका,
छोङा साथ पूरा भटका,
जग बदनामी कर मुझे लजाता,
पास बताता दूर ही पाता।।
तात तात होता अनजाने ही,
जाने किस बात पर होती चिढ़,
रीङ बने जो रोङा है,
मेरे पथ का ये भी फोङा है।।
हूँ अस्त होता किशोर मैं,
जीवन के हूँ शौर में मैं,
कहूँ ना तो भी सब सुन रहे,
कुछ नजदीकियाँ कुछ दूरी चुन रहे।।
करता स्वागत साथ वालों का,
दूर जाने वालों को सहर्ष धन्यवाद कहूँ,
व्यस्त हूँ अपने काम मुकाम में,
व्यस्त रहूँ जीवन और विकास मैं।।
-कवितारानी।
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