समझाओ ना / samajao na mujhe

 समझाओ ना


ना समझ नहीं मैं,

ना ही बच्चा हूँ।

अक्कल से कच्चा भले,

पर मन का सच्चा हूँ।

समझाओ  ना मुझे,

मैं नासमझ तो नहीं।।


हर बात कहते ही मान लेता हूँ,

सुनता हूँ ठहर कर।

कोशिश करता वहन करने की,

इतनी तो है समझ मुझमें।

ना समझ नहीं हूँ मैं।।


मन का साफ तो,

डराओ ना दुनिया से।

मन का साफ हूँ तो,

खैलो ना तुम मुझसे।

बच्चा नहीं मैं,

ना समझ नहीं हूँ मैं।

समझाओ ना मुझे।।


आज फिर से स्वार्थ दिखा,

हिम्मत वाला हूँ बहुत।

पर डर जाता हूँ मैं,

डर के भी समझ है कहीं।

ना समझ नहीं हूँ मैं।।


बात सपाट कहना वी आया,

कह दी मैंने आपने सुन भी ली।

सहन की आपने बस मतलब से,

आपके व्यवहार से मुझे।

मतलब का अहसास हूआ।

अब समझाओ ना मुझे।।


किस पर करुँ विश्वास मैं,

कौन मेरा सच्चा है।

उसझे है सब अपने मैं।

नासमझ हूँ रिश्तों में।

समझाओ ना मुझे।।


आज भी तेरी यादों मैं हूँ,

कहती है माँ मुझे।

तेरे पहरे में होती हूँ,

समझाती है मुझे,

बच्चा हूँ उसका ही मैं।।


नासमझ ही तो हूँ मैं,

कहने को कई बोल है,

समझ भी मुझमें,

समझाओ ना मुझे।

सब समझ आता है मुझे।।


साथ हो क्यों मेरे।

सब समझ आता है मुझे।

जो दूर है सपाट बयान है।

जो पास है वो मतलब करे।

जो पास आना चाहे।

कुछ तो मतलब तलाश करे।


जो दूर रहे घृणा, ईर्ष्या करे।

कौन नजर क्या चाहे।

सब समझ जाता हूँ मैं।

समझाओ ना मुझे,

सब समझ आता है मुझे।

ना समझ नहीं हूँ मैं।।


-कवितारानी।

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