वो तस्वीर धुंधली सी / vo tasvir dhundhali si

 वो तस्वीर धुंधली सी...


एक दीवार पर

जाने कब से टकी हुई थी,

कभी-कभी मौका मिलता

अच्छी मुझे लगा करती थी,

धुंध थी छाई रहती

या धुल लगी रहती थी,

वो तस्वीर धुंधली सी

जैसे कुछ कही करती थी।


जब-जब मैंने देखा

और पुरानी होती उसकी रेखा,

रंग हल्का रोता रहा

पर साफ ना कभी कहा,

कहती थी मुझसे वो

जो अनकहे शब्द वो,

कुछ समझा

कुछ को टाला,

मैंने वक्त गुजारा,

देखते हुए,

वो तस्वीर धुंधली सी।


अब जब पास गया,

कुछ मन में है दया,

साफ-साफ वो कह रही जैसे,

अपनी कहानी बयां की,

और मैं अब समझ रहा भी,

क्यों आज तक वो तस्वीर धुंधली सी।


कुछ रंग मुझसे चिङे हुए,

कुछ दीवारों ने ठानी,

द्रवित सी लगी वो,

जब निशान लगी दिखाने,

असहज असहाय उसके लिये,

बस शब्द यही रहे,

दुर से देखा अच्छा था,

अच्छी थी तब,

वो तस्वीर धुंधली सी।


वापस अपने काम पर,

मैं अपने मुकाम पर,

वो वहीं अपना समय गीन रही,

जो आये उसे अपनी दशा बयां कर रही,

रह रही जैसे-तैसे अपने हाल,

वो तस्वीर धुंधली सी।।


-कवितारानी।


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