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ये मेरा विद्यालय है / ye mera vidhyalay hai

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मेरा विद्यालय है सबका विद्यालय अलग है, हमारा सबसे प्यारा है, यहाँ अर्जुन जी के कंधों पर कमान है, दिनेश जी उनकी छाया है, प्रवेश होता शिल्पा जी से यहाँ, विद्यार्थी आते शान और शौकत जी से यहाँ, बालिका संभल कृष्णा जी से, तो बालक बल मनवीर जी से, ये मेरा विद्यालय है।।2।। आशा हेमलता जी से तो, तो कल्याण जी के सब लाल है, आशीर्वाद शम्भू जी देते तो, मुकेश जी ज्ञान बरसाते है, कमलेश जी मधुरता लाते हैं, तो बृज मोहन जी  सबको भाते हैं, ये मेरा विद्यालय है।।2।। राम कैलाश जी सबको अपनाते तो, बृजेश जी सबके गुण अच्छे से सुनाते हैं, पवन जी का अपना शीतल व्यवहार रहता, तो हीना जी का रंग रहता सब पर यहाँ, दुर्गा जी के चर्चे होते सरे आम, और जिसने ली शिक्षा  नानुराम जी से, तो गुजरता परमानन्द जी सा जीवन, और ऱाजकुमार जी से बनते बच्चे यहाँ, ये मेरा विद्यालय है।।2।। लक्ष्मी जी कृपा करती है. श्वेता जी सा महोल रहता है, स्वामी जी का आशीष मिला, जो चमकाया इसे अंजु, मंजु और सीमा जी ने, हर किरण प्रभाव करती है, भोला मन रखते सब यहाँ, दिन, महिने, बन साल बना, ये मेरा विद्यालय बना, ये है मेरा विद्यालय है।। -कवितारानी।

करवा चौथ की कहानी / karwa chauth ki kahani

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करवा चौथ की कहानी ये कहानी बङी निराली है, सबको मुझे सुनानी है, इसमें त्याग निखर आया है, सबको बहुत कुछ सिखाया है। मैं महफिलें छोङ आया, सारी यारी दोस्ती छोङ आया, रस्में जो निभानी थी, कस्में जो निभानी थी। ये कहानी है रिश्तों कि, अपनों कि दिलों कि, नजदिकीयों कि बंधनों कि, अपने एक दुसरे कि। इस कहानी का एक किरदार मैं, अपनेपन का हकदार मैं, पलभर के दिदार को, सेंकङो मील दुर आया। इस कहानी का एक किरदार आप, सुबह से भुखे प्यासे आप, राह तकते अपने चाँद का आप, कठोर व्रत करते आप। समय संग दिदार पाया, आखिर मिलन का वक्त आया, ये मिलन एक सुखद सार सा, कहानी में घुले प्यार सा। क्या दुं उपहार में, मेरे लिए किए उपवास में, मैं रास्ते भर जेबे और मन टटोलता आया, मैं प्यार भरा मन और एक निशानी लाया। और कुछ ना ज्यादा चाहुं मैं, तन मन से तुझे चाहुं मैं, रिश्ता अटुट रहे हमारा, इश्वर का रहे सहारा। ये करवा चौथ पावन हो, भरा जीवन और योवन हो, कोई आस ना अधुरी रहे, मन मस्त मगन तन स्वस्थ रहे।। - कवितारानी।  

पुरवाईयों सी खुशियाँ आ मिली/ purvaiyon si khushi aa mili

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पुरवाईयों सी खुशियाँ आ मिली   थी धुप अधखिली, चल रही मध्धम, मध्धम। साफ आसमां, पत्ते थे औझल-औझल।। महकती बगीया सी चल रही समीर वहाँ। आ मिली खुशियाँ पुरवाईयों सी जहाँ।। वहाँ मैं था अकेला भीङ भरी थी लाॅरी संग। अहसास था चलने का पर स्थिर था मन।। बह रही आकर आनन-फानन कण-कण। पी रहा था मधूर सोम वाहन-वाहन मन-मन।। अधर-गदर रोम-रोम था मचल रहा अन्दर। पाताल तन में जो रहता था अक्सर पतझङ।। बसंत थी आई लेकर टोली बनाकर हमझोली यों। खिल ही उठा मन पाई खुशियाँ पुरवाई जो।। जर्जर था जजांल वहाँ जो गंतव्य था जाने को चुना। ध्वंशावशेषो पर चित्र भी था लिया बुना।। रिक्त कालांशो में मन फिर जैसे कोई हवा चली। अनुभूतियों में पाया पुरवाईयों सी खुशी आ मिली।। कुछ तो खास अहसास हर घङी पा जाता हुँ। जब आवश्यकता हो उतनी देर महक जाता हुँ।। शुक्र करता रब का जो थी खुशी की घङी ली दी। अवकाश काल में मधुर पुरवाईयों से मुलाकात ला दी।। हर लम्हें में कुछ नहीं एक बात सामान्य थी मिली। खोये हुए अहसासों में मस्त मगन पुरवाईयाँ मिली।। निकले हुए लम्हों की, बातों की चली एक लङी। मेरे सुने लम्हों में पुरवाईयों सी खुशी मिली।। -कवितारानी।

मन की मन में / man ki man mein

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  मन की मन में इस निर्मोही मन की छाया, तन को तर ही पाया, विकट राह पर द्रवित है, अधर गदर मन भ्रमित है। विश्राम नाम ना, कामगार बस, समय रफ्तार मन से हार कस, चलता रहा नित निरंतर, मन में भरा छोङ अंतर। सुकुन आस ना चखता तन का, क्षण भंगुर आराम आता, एकांत में मन भर जाता। एक पल मन की सुनी ना जाती, टुट जाओ तब तक काम गाती, काया रत अपने सुर में, मन की दबी है बस अब मन में, अश्रु पुरित भाव  विभोर है, हर पल मन की चाह छोर है, रुकती नहीं चाह मन की, चलती रहती मन ही मन की, संध्या हुई विकल तन की, भौर ढुढंती ्परछाई कण की, बिन मन तन को कुछ नहीं भाया, द्रवित करती निर्मोही मन की छाया।। - कवितारानी।

एक पल को यादों में / Ek pal ko yadon mein

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एक पल को यादों में  एक पल को खो गया था। रोका बहुत मन  को, पर जानें क्यों रो ही गया था। कमी रही बीस साल से ज्यादा, एक बुँद ना मिली प्यास मिटाने को, पर तब भी तो जी रहा था। फिर जाने क्यों  एक पल ना लगा, आँखो के नम होने में, एक क्षण ना लगा, गालों पर सलवटें पङने में। सुन रहा था एक अभागे को, समझाइश उसकी थी रो में दिया। क्यों बात को बीच में छोङ दिया, सह ना सका कमी बतानें को, एक पल को खो ही गया था मैं, रोका बहुत पर रो ही गया था मैं। कुछ और समय दे दिया भावों को, बैठ गया फिर खुद को समझनें को, कमी एक थी आँचल की, जो ढक ना सकी मेरी कोमल काया की, कमी थी तेज धूप जलाती रही, आंधियाँ, लू सब बर्बर छेङती रही, जल गयी कोमल छांव मेरी, सर्दी ने भी खुब कहर बरपाया, जो अपने ऊपर आँचल ना पाया। फिर चाह हुई कोमल प्रेम गोद की, सिर रख सो जाता कभी मैं, कोमल तकीया मुझे मिला ही नहीं, ना ही उसमें रहा प्यार पाया कभी, होता क्या प्रेम, लाङ रुप, सोया नहीं गोद तो जाना नहीं। कोमल बाहों से गले लगना, ह्रदय के लगाव को सुनना, अधुरा रहा वो मोह रुप भी, मिला नहीं बस गीला यही, एक पल को ये ठेस लगा, खो ही गया था मैं याद करत...

काली अंधियारी रात / kali andhiyari rat

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  काली अंधियारी रात काली अंधियारी रात डराये, बैरी मन आये पिया मन भाये। अंखियन बैरी चैन ना आये, रात भर जगाये, भौर को सताये।। चाहे क्या जानूं ना, समझुं ना, अंधियारा काला। जाऊँ कहाँ जाऊँ, दिखे ना सहारा हारा।। काली अंधियारी रैना नैनन छाये, पीङा मन लाये, ये क्रिडा कर जाये। अंखियन घनी  काली  कर जाये, सपने ना आये, सपने समझ ना पाये।। कहुँ भी किससे कभी मर्ज है इसका नहीं। सहुँ भी तो कैसे कभी सह मैं पाऊँ नहीं।।    काली अंधियारी बातें बिसरावे, मति ना भावे ये मति समझ ना पावे। अंखियन नित-नित नीर बन जाये, बिन बदला ये सागर बन बह जाये।। जाऊँ चहुँ ओर कहीं चंदा रस पाऊँ मैं। भुला बिसरा कोई राह टकराऊँ मैं।। काली ्अंधियारी ये मावस चंदा छुपावे, तारों में अब राह कैसे पाये। अंखियन पथराई देख-देख राह, ठोकर खायें, गिर उठ चल जाये।। भय किया भय हुआ दिखे नहीं कोई चारा। बैठा छौर अकेला मैं हुँ किस्मत हारा।। काली अंधियारी रात गुजर जाये, बैरी मन माने ये तन को रिझावे। अंखियन बैरी धीर धर जाये, चैन आये जो रोशनी आये।। कट जाये अंधियारा सुबह जल्दी आये। मन समझ जाये बैरी मन मान जाये।। काली अंधियारी र...

प्रेम जीवन | prem jivan

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प्रेम जीवन  करुणालय की कराह आती, मन को भाव विभोर कर गाती, आती ना समझ एक पल जीवन धारा, तन का जीवन लगता जैसे मन का हारा। ये गाथा जीवन की लगती भारी, आह आती दिल से, कि काया गारी, मन का मौजी भी बोझ रखता, प्रेम जीवन जीकर हर कोई मरता। मर मर के जीया, मन का हारा, प्रेम रस पीकर अमर कर दिया दर्द सारा, सारा जग अब लगता अंधियारा, प्रेम जीवन संघर्ष ही गा रहा। प्रेम पीङा भारी भाई, प्रेम ही जीवन सार भी, प्रेम ही सब दुखों कारण है, प्रेम जीवन कठोर है, प्रेम जीवन कठिन है।। -कवितारानी।

सुकून मिला | sukun mila

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सुकुन मिला कहीं दबे मन के कोनों से कराह और कसक लगती थी, दिल में चाहत है दबी बहुत ऐसी कराह जगती थी, एक पल को जब बात हुई अनजान से, अनजाने से, दिल को जैसे ठण्डक और राहत मिली, हाँ सुकुन मिला।। लब्जों में बयां करूं कैसे क्या दिल को हुआ, वो आवाज अनचाही सी आई और दुनिया ही भूल गया, बात हुई ऐसे जैसे मैं था यहीं तक सिमट गया, कहुँ कैसे- क्या था ये हुआ, बस समझ आ रहा, सुकुन मिला।। धङकनों पर काबु ना रहा, अनजान था वो अब अनजान ना रहा, असहाय दिल बेवजह फिर उलझ गया, बस लग रहा अभी कि, सुकुन मिला।। यह ऊर्जा का संचार हर नब्ज में दौङ रहा, है जहर प्रेम की ये प्रेम ही रगों में घुल गया, दवा ढूँढू जाकर कहाँ, मर्ज भी है कहाँ, कारण तलाश रहा और मन बता रहा, सुकुन मिला।। है सवाल तो रहने दे, ऐ रवि रत रहता है, फिर रत रहने दे, लग सपना था, सपना ही मान ले, है सुकुन दिल में तो, सुकुन ही जी ले।। मत कह की क्या मिला, दिल को कह रहा तो कह दे, अनजाना, अनचाहा लम्हा था, इसमें सुकुन मिला, हाँ सुकुन मिला।। - कवितारानी।

अश्रु धार बह आती है | Ashru dhar bah aati hai

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  अश्रु धार बह आती है। उमङ आती गहरे सागर से, नैनों के बांध ठहर जाती है। झलक उठती पैमाने से, नम धरा कर जाती है। बहती कभी लकीर सी, कभी गंगाजल सी लहराती है। मेरे मन के कोनो से, अश्रु धार बह आती है।। लगती है पीङा भरी, अपार दर्द की निशानी है। रुखे पङे कपोल लकीर को, पल भर में तर कर जाती है। चलती सीधी सपाट सी, नदिया ये बहुत खारी है। एक ठोर लबो को छुकर, अश्रु धार बह आती है।। रंग नहीं बताने को,  खुद ही एक कहानी है। आती अंधेरे कोनो से, ऊँजाले में सब बताती है। आलिशान सी काया पर ये, खंडहर की निशानी है। विशाल हृदय से सागर से, अश्रुधार बह आती है।। बेजुबान बेहया होकर आती, सबको भाव विभोर करती है। अपनो को पास लाती, गैरों की पहचान कराती है। कौन साथ पावन धरा में, हकीकत से रुबरु कराती है। बेसमय मन भर आकर, अश्रु धार बह जाती है।। भार बहुत लगता है, तभी मन हल्का लगता है। निकल जाने पर नैन झील से, ये पानी कहाँ रुकता है। खाली होते दर्द के प्याले, हिम्मत बङती तब रुकते हैं। बखान होता फिर होंसला था टूटा, तभी अश्रु धार बह आती है।। पावन, शीतल, शांत जल सी, भरी हथेली अश्रु जल की। एक-एक बूँद कर तौला जब, कितना थ...

शुभकामनाएं | shubhkamanaye

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शुभकामनाये  सुना था कुछ लोग खास होते हैं। जो हमेशा मन के पास होते हैं।। कहने से पहले उन्हें सोचना ना पङता। सब बताने को भी न नहीं डरता। ऐसे लोग खास होते हैं। पाकर उन्हें देव साक्षात होते हैं।। व्यस्त समय कौन किसकी सुनता है। दुख सुनकर कौन सही सिख कहता है। समय सार बहुत आते मुखर जाते हैं। कुछ खास लोग ही साथ निभाते हैं।। उम्र सीमाओं से दूर अपना आभास कराते हैं। नर नारी भय से मुक्त मन लगाते हैं। दुर्लभ ही ऐसे मित्र संसार में टकराते हैं। अपनी साफ छवि जीवन भर को छोङ जाते हैं। धन्य उन अभिभावक को जो साफ मन को जन्म दिया। सिख दी सच्चे मन की सीमाओं में रहने की। आभार इश्वर का जिसने अवसर पर पहचान कराई। मित्र बनाकर प्रतिभावान से बात कराई।। भावी जीवन की कई सारी शुभकामनाऐं मन से आती है। ऐसे मित्रवत् मानव पर झोली खाली हो जाती है। देने को क्या दे शुभाशीष जो सर्वोत्तम।  सफल सुखद जीवन रहे बनों हमेशा सर्वोत्तम।। गगन गुंजे जयकारों से शिखर नाम तुम्हारा हो। शुभकामनायें इस अवसर पर जीवन आपका न्यारा हो। कमी रहे गमों की दुखों सै छुटकारा हो। प्रगति पथ उज्जवल रहे रोज मौज तुम्हारा हो। शुभकामनायें है मन से सब स...

मुझें अपनी राह चलना है | mujhe apni rah chalna hai

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मुझे अपनी राह चलना है बहते दरिया को अपनी राह चुननी है। हो पत्थर, पर्वत, खाई उसे अपने हिसाब से चलना है।  मदमस्त मगन राही को अपने लक्ष्य चुनने हैं।  मैं राही मतवाला, मुझे अपनी राह चलना है। । कोई सुने मधुर कोयल को या करे अनदेखा इसे । गाना है पपीहे को, कोयल को उसे क्या लेना दुनिया से । हो अपनी दुनिया अपने हिसाब की, अपना ही कर्म रहे। होता है जो हो जाये जग में, मुझे अपनी राह पर चलना है।। मधुर बोल मन भरे, या कङवे बोल चुभे मन में।  मन का मजबुत राही, बिना रुके चले अपनी धुन में।  सागर से भरे जग में अपना वजुद जो रखना है। अपने मन से बने राही को, अपनी राह चलना है।। उङते बादल को अपनी जगह जाकर बरसना है। हो बाधाएं हजार जिसे बढ़ना है, उसे ना रुकना है। अपनी मंजिल के मतवाले राही को भी यूँ बढ़ना है। मैं भी राही मतवाला, मुझे अपनी राह चलना है।। -कवितारानी। 

शिक्षक | shikshak

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  शिक्षक  जो मिले जीवन में सब ज्ञानी लगे। मुझे शिक्षक बनकर भी सब महाज्ञानी मिले। मैं भूल जग को अपनी कहता हूँ।  मैं अपनी कक्षा में रहकर ही खुद को शिक्षक कहता हूँ।। शिक्षा का सार गहरा, पूरी दुनिया पर है इसका पहरा। जो ज्ञान सागर तट पर ठहरा, उसका ध्वजा रहता लहरा। मैं सूक्ष्म से परिचय देता, है जो पास मेरे शिष्य को देता। मैं अपनी किसी से ना कहता, अपनी दुनिया ही मैं सिमटा रहता।। मेरे शिष्य मेरा धन है, मेरी आजीविका भले कम है। मेरा विषय सब ज्ञान है, भले जग में फैला विज्ञान है। मैं क्रूर बनूं या मृदुल बनूं, पर अपने शिष्यों का भविष्य बुनूँ। मैं विद्यालय में रहूँ या समाज में रहूँ, पर मैं अपने देश की कहूँ।। मन से जुङाव गहरा रखता हूँ, मैं शिष्य-शिष्या को समान देखता हूँ।  अमीरी-गरीबी से दूर रहता हूँ, मैं हर प्रभाव में एक सा रहता हूँ।  मैं शिक्षक हूँ, शिक्षा देता हूँ, शिक्षा कहता हूँ, प्रश्न सुनता हूँ।  मैं शिक्षक हूँ, सुधार करता हूँ, आधार बनाता हूँ, देश बनाता हूँ।। मितव्ययी हूँ, मैं समाजसुधारक हूँ, मैं विद्या दाता हूँ।  प्रशंसक हूँ, बुराई का कंटक हूँ, मैं अच्छाई देने...

रवि; दिन की गाथा | Ravi din ki gatha

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रवि मैं: दिन की गाथा    उठ जाग ज़रा देख पूरब, रवि आया लेकर एक हब। नयी जोत है नया उजाला, उमंगो से रंगा है सवेरा। कहता है कि मैं दिनकर, लिख चुका हूँ शुभकर। उठो! जागो मुँह  धो लो, अपने जन्मदाता के चरण धो लो। मुझे अर्पित जल है भाता, मुझसे पहले प्रणाम विधाता। छोटो को अब प्यार बांटना,  बङो को तुम आशीष ताकना। मधुर मुस्कान होंठो पर हो, क्षमा भरा आज मन हो। आगे अब मित्र आयेंगे, शुभकामनाओं के गीत गायेंगे। मुँह मिठा सबका है करना, खुश होकर स्वागत करना। कोई जो रुठे मनाना तुम, अपनी धुन में ही गाना तुम। आज किसी की सुननी नहीं,  जो मन आये करना वही। बेबस कक्षा में हारना ना, खाली समय बिगाङना ना। मैं चल रहा हूँ नित निरंतर, आगे का प्लान का रहे अंतर। मित्रों के साथ खुलके मौज हो, खर्चे पर कोई फिक्र ना हो। आज का दिन सबसे उत्तम, भुल जाना कल का गम। गुरूजनो को प्रणाम कहना, कोई रुठे उखङे छोङ देना। हमें नहीं रूकना आज, मैं चल रहा साथ चलना आज। दोस्त माने तो घूम आना, जहाँ कहे मन वहीं जाना। निर्धन लाचार पर दया करना, बच्चों बुढ़ो को प्यार करना। अब ढलता हूँ मैं इतना कह,  खुब खुशनुमा रहेगा दिन...

अरदास मन की | Ardas man ki

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अरदास ऐ सुनी वादियों सुन लो मेरी जरा, ऐ सुने लम्हों देख लो ज़रा।  मैं बंजारा, मैं मतवाला ढूँढ रहा जीने को कुछ धरा। ऐ रूठे लम्हों मान लो मेरी ज़रा,ऐ मस्ताने पल आ भी जाओ जरा। उम्मीदें लाख दुआऐं हजार साथ है, एक बार सुनों कहता मन मेरा क्या? ऐ बुझी हुई दीपक की लो; दे दो उजाला जरा। पथ पर हुआ अंधेरा है मिल जाये थोङी राह। ऐ सुनी वादियों दे दो बसंत यहाँ जरा। कब से पतझङ झेल रहे अब तो मिल जाये उल्लास यहाँ।। ऐ जाते हुए लम्हों यहाँ ठहरो तुम जरा। थक गया हूँ मैं, मुझको दे दो पल भर की साँस जरा। ऐ मासूम वादियों दे दो प्यार की बरसात यहाँ।  सुखा झेल रही जिन्दगी को मिल जाए फिर राह।। ऐ रुठी हुई चाहत मिल जाओ मुझसे जरा। हुस्न और चाहत की मिल सके कुछ धरा। ऐ मजबूर मेरी हालत, दे दो कुछ ताकत जरा। जी सकूँ दम से नहीं तो, मर जाऊँ फिर यहाँ। । -कवितारानी। 

गुङिया है | Gudiya hai

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गुङिया है  माटी की मुरत, भोली सी सुरत। वो नखराली है, वो प्यारी है। वो प्यारी है। प्यारी सी सुरत, मन मोहे, मन भाये। मन भाये ये गुङिया रे। मनभाये ये गुङिया है।। ओ आँखो में काजल, सोहे मन को लुभाये। माथे बिदियाँ लागे तो चाँद भी लजाये। लजाये दुनिया, मुनिया ये प्यारी है। मन प्यारी, ये गुङिया है। ये गुङिया है।। प्रित करो, लगाओ हिया से। हिया से कहो, भेद मिटाये ये।। भेद ना करना, करना ना बैर। जानी है एक दिन , तेरी छोङ रैन। छोङ तेरी रैन ये चली जाये। प्यारी सी गुङिया शर्ममाये ये। हो प्यारी गुङिया है। गुङिया है।। -कवितारानी। 

मन भावन | man bhavan

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  मन भावन हो चंचला चालाक तुम जैसे सावन। चिढ़ती हो अनायास जैसे शीत पावन। जीवन गहना है पहना हुआ जैसे ग्रीष्म रावन। मृग मरीचिका आभास होती हो जैसे मनभावन। । अडिग, असहाय, असमंजस में।  अस्थिर, अनजान सी मन में।  रुप चन्द्र सा दिखाती हो हर सावन। लगती हो अक्सर यूँ ही मनभावन।। काली घटा घनघोर मेघ सी। कैश कला प्रायः लगती निश्छल सी। हरयाली नयनसुख बर्खा सी पावन। देख तुम्हें बात आती यही कि तम हो मनभावन। । ध्यान, ज्ञान एकाग्रचित्त लिये।  मेगा बरसे वहीं जहाँ मन हुए।  सुनती कहाँ किसी की करती अपनी गायन। हर पल देख तुम्हें मन यही कहे तुम हो मनभावन। । दूर दृष्टि तकती हरियाली पावन की। भौर समय बिताता देखकर ही। नयनाभिराम तुम अस्पर्श रही सुख सावन। हर बार दुख हरती इसलिए मनभावन। । -कवितारानी। 

मेरी गुड़िया | Meri Gudiya

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  मेरी गुड़िया  वो छोटी सी गुङिया, माटी की पुङिया। आँखो में सपने, बातों में लङियां। दाँतो में चमचम, हॅसती हरदम। कहती है मुझसे, ला दो ना चुङियाँ। ला दो ना चुङियाँ।  चुङियाँ, गुङिया पहने तु हाथों में।  जाऊँ मैं ढोली में, बैठ मैं ढोली में।  घूँघट ओढ़ के, होऊँ विदा फिर। आऊँ ना गलियाँ, तेरी गलियाँ।  भूल मैं जाऊँ फिर तेरी गलियाँ।  खुब सुनाया तुमने, खुब रुलाया तुमने। अपना कहा भी, पराया बनाया तुमने।  कहता रहा तु, बापु मेरा तु। तू मेरी गुड़िया, माटी की पुङिया।  तेरी आँखो के सपने मेरे अपने। खुश रह जा तु ले ले गुङिया।  रो ना गुङिया, अभी ना रो तू। ले ले गुङिया, रो ना गुङिया।  ले ले गुङिया, ना ले चुङियाँ।  मेरी गुड़िया। । -कवितारानी1 

दास्तां ए जुल्म | Dastan E julm

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See video here दास्तां ए जुल्म  अभी शब्दों में दम ना था ना थी समझ कोई।  बालपन में उतरा की आधी रोटी खाकर आँखे थी रोई।। शुरू था सफर दो कदम ही बढ़ा होगा घर से आगे। अभागे मेरे भाग मेरी माँ को यम ले साधे।। आधा अनाथ शराबी नाथ के कहर से रहा कांपता। हर दिन गाली मार की लाली भय हर ओर रहा भांपता।। कभी पिङियो का बिस्तर कर पागल ने सुलाया जोर से।  कभी बंद कर कमरे में रात भर डराया जगाया शौर से।। कभी अचानक भूत सवार लेकर आया नग्न किया परिवार में।  कभी मद अंधा होकर मारा पिटा नंगा कर भगाया संसार में।। रात दहशत से जागी भागते फिर बचाव की चाह में।  हर दिन हशरत रही मिले भरपूर भोजन बचपन की कराह में।। शाक का पता ना था रोटी खाई कई बार प्याज से। शाम का डर था मांग ना हो कहीं पैसों की आस से।। फटे पुराने लिबाज में सह रहा जीवन कर हिम्मत अपने आप में।  एक-एक कर जोङ रहा पुरी करता कमियाँ अपने आप से।। एक बैरी काफी ना था एक पागल और बनाया साथ में। हर एक नजर रखता मारता गालियाँ देता अपने हिसाब से।। अपमान सहता शब्दों के शर्म से मन मारता जीता मुस्कान से। किसी ने छेङ दास्तां ए जुल्म याद आया अपमान ये...

गुरुवर नमन | Guruvar naman

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गुरुदेव नमन हे गुरुवर ! गौरवगान तुम्हें।  ईश्वर तुल्य आप, मन से सम्मान तुम्हें।। पथ प्रदर्शक आप ही, आप ही आदर्श हमारे। निर्बुध्दि हम आप ही ज्ञान हमारे।। नत मस्तक नित जो आप जो किये। अशांत उर प्रकाश कर शांत ह्रदय दिये।। अभिभावक भाव नियमित आप रहे हमेशा। पावक ज्ञान संयमित राग दिये हमेशा।। हम नादान नटखट शरारत करते आप से ही। शक्त संयोजित नियंत्रित करते भी आप ही।। हर दिन, हर पहर, नव ज्ञान सागर दिये आप। नियमित रह, हर भ्रम भूल, बिसरा आप, ईश्वर तुल्य रहे आप।। कठोर हिमालय बन ज्ञान गंगा स्नान दिया। विकट मोङ संशय हर आप ही ने गतिमान किया।। इस जीवन जीव अभिमानी बस काया लेकर आये। आलोक ज्ञान लोक का जलाकर आप से ही मानव कहलाये।। हे गुरुवर! करुणायल आभार आपका।  जीवन जोत प्रकाश गौरव फैला मुझमें आपका।। नित नमन नत मस्तक प्रणाम करुँ मैं।  इस जीवन ज्ञान आलोक से आपका ही बखान करूँ मैं।। जीवन आधार विशाल वट हर पल्लव नमन आपका। इस जीवन श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन सा हो आलोक, चाहे आशीष आपका।। सितम्बर पांच एक अवसर संजोये करें सत् सत् नमन आपको। हमारे जीवन में शिक्षक बन कृपा की आभार आपको।। नमन आपको।। -कवितारान...

शिक्षक आशीर्वाद रहे | shikshak aashirvad rhe

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शिक्षक आशीर्वाद रहे । शिक्षक दिवस है आया । खुशियाँ भर सम्मान है लाया । साल भर में ये एक दिन बनाया । मेरे शिक्षकों का बखान कराया । नित शीश नमन, आभार व्यक्त करुँ । करबद्ध नत मस्तक मैं याद करूँ । कृपा रही, शिक्षा दान रहा क्षमा का भाव रहा । वर्ष पर्यन्त जब आपका आशीर्वाद रहा । मैं नियमित हित जगत का पथिक बना । मर्यादित, आशावादी, साहस का साथी बना । प्रगति पथ पर मंजिल आसान रही । आपकी कृपा छांव में जो मेरी थान रही । मेरी नादानी और शैतानियों को आपने सहा । गलतियों पर मेरी आपकी विनम्रता का दान रहा । गान आपके आलौकिक भाव का करुँ । मैं आज नित शत्-शत् नमन करुँ । है उत्सव आज गान रहे । मेरे गुरुवरों क सम्मान रहे । कृपा आप पर ईश्वर की बनी रहे । मुझ पर मेरे गुरुवरों का आशीर्वाद रहे ।। -कवितारानी।  

हमारे मन में निवास करते हो | Hamare man mein nivas karte ho

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हमारे मन में निवास करते हो  घर परिवार से दूर रहते हो । अपनी पीङा और दर्द छुपाते हो । बन कर्मठ कर्तव्यनिष्ठ शिष्टता दिखाते हो । मधुर मुस्कान से मन पर छाते हो । कृतघ्नता से अपनी हमें  कृतज्ञ करते हो । ज्ञान सागर उङेल हम पर आह भी ना करते हो । ज्ञान प्रकाश फैलाकर अंधकार हरते हो । कोमल वाणी बोल मन हरते हो । हास्य कथा कह खुद ना हसते हो । अनुशासन का पाठ अनुशासित करते हो । प्रेम सौहार्द बता प्रेम सागर बनते हो । विशाल ह्रदय बता मन खाली रखते हो । दोष क्लेष दूर रख संयम सिखाते हो । आभा अपने व्यक्तित्व की लुटा दीपक बनते हो । पथिक हमारे बनके पथ भी बनाते हो । अपनी कमियाँ छुपा हमारी हरते हो । सर्वगुण सम्पन्न हमें गुणवान करते हो । शिक्षक, गुरु, अध्यापक रुप में आप आभार करते हो । जीवन सफर को स्पर्श कर यादगार बनते हो । आप हमारे मन में निवास करते हो ।। -कवितारानी। 

सवालों में क्यों | savalo mein kyon

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सवालों में क्यों ? सवालों के घेरों में, बैठे हैं वो ढेरों में।  अपनी माटी पाक साफ बताते, दुसरों पर लाछन लगाते।। क्यों ना कहे दोगले तुमको, जब खुलकर ना बोलने देते हमको। अपनी ही राग अलापते, बेचारे बन धाप डकारते।। सवाल तभी किया होता तुमने, जब-जब सवाल सबमें होता हममें।  तो ना आज नफरत से भरते, तुम भी भारत माँ की जय कहते ।। जब जीत रहा था भारत मेरा, तुम मायुस क्यों होते । जब हार रहा दुश्मन से, तो घर आंगन क्यों खिला होता ।। जब पत्थर फेंक सिपाही था घायल होता, तब भी रोना होता । जब दुश्मन बंद महीनों रखता, तब भी दम घूटा होता ।। खुलकर तारीफ़ कभी देश की हमेशा जो तु करता । तो आज सवालों के घेरे में ना आकर खङा होता ।। अब पूछ रहा हूँ तो ये भी बतलाओ तुम । धर्म के नाम पर दुसरों की धर्म प्रचार से क्यों चिढ़ जाते तुम ।। अपनी गिरबान में जो तू झाँक लेता । समय रहते अपनों में कमियाँ ढूँढ लेता तो ना ऐसा होता ।। जवाब देकर बचना आता है, सवाल पर सवाल करना आता है । पर कभी धर्म से बढ़कर देश कहा होता, तो सवालों के घेरा में ना होता ।। अब भी जिसकी खाओ खुलकर गाओ तुम, बस नफरत मिटाओ तुम । ये भारत देश तुमसे-मुझसे है,...

मुझे अपनी राह चलना है | Mujhe apni raah chalna hai

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मुझे अपनी राह चलना है  बहते दरिया को अपनी राह चुननी है । हो पत्थर, पर्वत, उसे अपने हिसाब से चलना है । मदमस्त मगन राही को अपने लक्ष्य चुनने हैं । मैं राही मतवाला, मुझे अपनी राह पर चलना है ।। कोई सुने मधुर कोयल को या करे अनदेखा इसे । गाना है पपीहे को, कोयल को क्या लेना दुनिया से । हो अपनी दुनिया अपने हिसाब की, अपना ही कर्म रहे । होता है जो हो जाये जग में मुझे अपनी राह पर चलना है ।। मधुर बोल मन भरे, या कङवे बोल चुभे मन में । मन का मजबूत राही, बिना रूके चले अपनी धुन में । सागर से भरे जग में अपना वजूद जो रखना है । अपने मन से बने राही को, अपनी राह चलना है ।। उङते बादल को अपनी जगह जाकर बरसना है । हो बाधाएं हजार जिसे बढ़ना है उसे बढ़ना है । अपनी मंजिल के मतवाले राही को भी यूँ बढ़ना है । मैं भी राही मतवाला, मुझे अपनी राह चलना है ।। - कवितारानी।

मुझे तुम बहुत भाती हो | mujhe tum bahut bhati ho

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मुझे तुम बहुत भाती हो  मेरी छोटी मोटी बातें सुन । मुझसे रोज जुङ जाती हो । अपने बचकाना अंदाज में । खिलती हो और मुस्काती हो । बहुत सारों को जानता हूँ मैं । पर तुम मुझे बहुत भाती हो ।। सच पर अङी रहती हो । मिठे बोल बोलती हो । परेशान रहूँ मैं जब भी । समाधान बन आती हो । एकान्त मुझे है भाता जैसे । वैसे तुम बहुत भाती हो ।। विश्वास बनाये रखती । कभी चिढ़ती चिढ़ाती हो । रिश्ता नहीं खुन का अपना । पर रिश्ता अटूट बनाती हो । कुछ ही लोग है खाश मेरे । तुम उनमें एक अनौखी बन जाती हो ।। भीङ बहुत है मेरी दुनिया में । पर मुझे तुम बहुत भाती हो ।। -कवितारानी। 

कहीं ठहर जाऊं मैं | kahi thahar jau main

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  कहीं ठहर जाऊं मैं  बहता दरिया हूँ मैं, कहीं तो रूक जाऊँ ।  ऊँची निची राहों से, कलरव ठुकराऊं ।। शांत सुकून कुंज सिंचू मैं । एकान्त वृक्ष पुंज से खुद को रिझाऊं मैं ।। कब से धरा कई बहा लाया हूँ । किनारों पे इतिहास की मिट्टी सजाया हूँ ।। रोक लूँ शीतल करने को, मध्धम हवा लूँ सी को भी । ठहर जाऊँ कहीं प्यास बुझाऊँ इस जग की हमेशा ।। जाकर दूर तक सागर में मुझे ना मिलना । नमकीन अस्वाद नीरस पय मुझे ना होना ।। सार अनन्त जग का गुणगान पुष्कर बनूं मैं । बहता दरिया हूँ मैं इच्छा करता कहीं ठहर जाऊँ मैं ।। -कवितारानी। 

घर आजा / ghar aaja

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  घर आजा संध्या की लाली, मन की प्याली, वो प्यास बढ़ाये, घर आ... घर आजा पंछी, सांझ हुई । थक गई  है जमीं,  खो गई आस भी, रोशनी की चाह भी, अब मन को समझा, संध्या हुई भोले मन, घर आजा, घर आजा पंछी, सांझ हुई आजा । भौर का तारा करता इशारा, कहया है दिन ढूब गया, सांझ का हुआ इशारा, ओ सांझ का सहारा, लौट जा अपने घर, मन को समझा ना । कोई नहीं आयेगा, ना मानेगी ये सांझ,  होगा ना रोशन जग, घर आजा ।। संध्या लाली, मन की प्याली, पी गई प्यास, मन की आस, अब सुन ना मन की, करले नियम की, खतरों कि जग जागा,  जागा है खतरा आजा, सांझ हुई मन आजा, घर आजा ।। देख पपीहा गया, वो मैना गई । राग अधुरा, अधुरी प्यास रही । काम अधुरा, गडरिया भी गया, खैत छोङ, किसान भी गया । गयी है गय्या, धरती की किव्वया, बढ़ गया अंधेरा, अब आजा । आजा घर आजा, वो राह निहारे, घर आजा ।। कल फिर जाना है, यह सब दोहराना है । कर्म भूमि रण है, वक्त की पुकार है । सांझ को जाना, भौर को आना । जीवन का गाना, आजा घर आजा । मनवा घर आना, वो माटी घर की, चुल्हा घर का । वो चक्की का शौर, भायेगी फिर भौर । चले आना फिर तुम, अभी आजा, संध्या लाली । गाये धु...

एकांत याद आता है | Akant yaad aata hai

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एकांत याद आता है । भीङ भरी दुनिया में, मैं अपने आप को खोजता हूँ । कुछ पल अकेला रह, मैं अपने एकान्त को खोजता हूँ ।। मेरा एकान्त बङा प्यारा था, वो जैसे मेरा सहारा था । जब कभी मैं दुनिया से हारा था, इसी ने मुझे संवारा था ।। मुझे एकान्त याद आता हैं, मुझे यही बस एक भाता है । मुझे कहने को बहुत कुछ आता है, ये सब मुझे एकान्त में ही बताना आता है ।। ये धैर्यवान था और सुनता मेरी आराम से । खुब समय रखता मेरे लिए और बङा मन रखता था मेरे लिए। । कभी छल कपट ना दिखा मुझे मेरे एकान्त में । कभी झूठ फरेब ना पाया मैंने एकान्त में ।। भीङ भरी दुनिया में घूम, मैं अपने लिए समय खोजता हूँ । कहीं बह सकूं सतत झरने सा मैं, अपने लिए जगह ढूँढता हूँ ।। जहाँ जाऊं मनमैलों को पाता हूँ, स्वार्थ से घीरे लोगो को पाता हूँ । मैं सच्चा बन, सच्चा रहना चाहता हूँ, इसीलिए एकान्त को चाहता हूँ ।। कहीं समय का छोर पाकर, शाम को शांत बैठ जो जाता हूँ । वहीं एकान्त याद आता है, और मन बचपन को गाता हूँ ।। मुझे एकान्त प्यारा लगता है, मेरा मन बस वहीं लगता है । मुझे फिर से वही जीना है, मुझे बस यही कहना है ।। -कवितारानी।

अच्छे लोग कहाँ ? | Achchhe log kahan

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अच्छे लोग कहाँ ? कलियुग पर दोष दूं, या फिर जमाने पर आरोप लगाऊं । मन में दुख भरा हुआ, इस कहुँ लिखुँ या गाऊँ ।। कहुँ किसे-सुनने वाले ऐसे अब बचे कहाँ, जो सुने भी मेरी । सबको अपनी पङी है, लिखुँ तो भी पङेगा यहाँ कौन मेरी ।। गाऊँ जो अपने दुखङे, मुखङे खिले लगते सबके यहाँ । सोंचे जो कि दुख से आनन्दित हुए ये, तो सच ही है अच्छे लोग कहाँ, यहाँ ।। जब जग में मनोरंजन प्यारा, बुरे लोगो का मनोबल रहेगा हारा । अच्छों की कदर नहीं, तो अच्छे लोगो का मनोबल रहेगा हारा ।। आवेश की कभी लहर चलती, नेट बंद की भावनाऐं शांत रहती । उकसावे से संवेग चलते, फिर स्वचालित, स्वविवेकी रहते मरते ।। मैं भी था अच्छा, मन का था सच्चा, जब था मैं बच्चा । अब जब बङा हुआ, बुरों से मिल रहा, समझ रहा, अच्छों के लिए जगह कहाँ ।। अच्छे लोग बस भाषण में अब मिलते हैं । कोई कमेंट करे या रिप्लाई यहीं दिखते हैं ।। ये एक आभूषण सा बन गया । हर बुरे तरह के लोगो को ये जम रहा । जम रहा की अच्छे दिखे हम । चाहते है कि सब अच्छा कहे हमें । दिखाते है कि हम है सबसे अच्छे ।। कर्म की जब बात आये, या देश की ही जब बात हो । त्याग की कुछ कहनी नहीं, स्वार्थ से बढ़कर ...

दूर तुमसे मन नहीं लगता | dur tumse man nahi lagta

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  दूर तुमसे मन नहीं लगता  अब आदत हो गई है, साथ रहने की आदत हो गई है । तुम्हारी आदत हो गई है, मन को लत सी हो गई है । अब मन नहीं लगता, बिन तुम्हारे कुछ नहीं जमता । शब्दों को सुनने की, तुम्हारी आवाज की आदत हो गई है ।। साथ सुहाना है मन का बहाना है । बहाना है, रह लेगे ऐसे भी वैसे भी । रह ना पाता एक दिन भी । दूर तुमसे मन नहीं लगता है ।। गये जब दूर तुम तबसे दीवारें खाती है । बंद कमरे में अकेले में हर चीज कुछ सुनाती है । छोटे-छोटे काम याद आते हैं । बिन कहे ही शब्द गुंजते जाते हैं ।। अब मन नहीं लगता अकेले में । अब रहा नहीं जाता अकेले में । अब सब शांत लगता है । दूर तुमसे मन नहीं लगता है ।। - कवितारानी।

समुह | Samuh

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  समुह  दल कहे या दलदल, ये समूह मुझे समझ नहीं आते । पाबंदियों को दोहराते, ये समूह रुकावटे हैं लाते । सारे समूह नहीं बुरे, ठीक ही कहा किसी ने । पर सारे समूह सही, ये ना कहा किसी ने ।। वो दल जो दलित बनाकर शोषण करे । वो दल जो स्वाधीन को अधीन करे । वो दल जो बल से राज करे । स्वतंत्रता ना जहाँ वो दल सही कहाँ ।। आत्म सम्मान जहाँ समान ना हो । जहाँ किसी एक मत का अधिकार हो । जहाँ किसी की बात मानी ना जाये । वो दल समूह कहाँ तक सही ।। अच्छे से अच्छे दल बिखर जाते है । जब शिखर की बात तक कोई ले जाते हैं । तब बस एकान्त का राही होता है । मंजिल पर हर कोई अकेला खङा होता है ।। तो मित्र चुनों, मित्र समूह नहीं । अपना लक्ष्य चुनों, दल को नहीं । अपनी राह चलो सबकी नहीं । सबको साथ रखो पर रहो अकेले ही ।। -कवितारानी।